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अगली ख़बर Sunday Special: 30 दिन में 3 ग्रहण, जानें ग्रहण का यह प्रभाव कैसे दिन दिखाएगा मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई, पढ़ें अकबर इलाहाबादी की शायरी और शेर अकबर इलाहाबादी की शायरी (Akbar Allahabadi Shayari): दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं,बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं... Sunday Special: 30 दिन में 3 ग्रहण, जानें ग्रहण का यह प्रभाव कैसे दिन दिखाएगा NEWS18HINDI LAST UPDATED: MAY 2, 2020, 11:29 AM IST अकबर इलाहाबादी की शायरी (Akbar Allahabadi Shayari): अकबर इलाहाबादी उर्दू के महान हास्य कवि थे. उनका वास्तविक नाम यद अकबर हुसैन रिज़्वी था. उनकी कविताओं में प्रेम, हास्य, जीवन और व्यंग का बढ़िया पंच होता था. उन्होंने उर्दू जैसी शाइस्ता (मीठी) जुबान में जब अपने ठेठ इलाहाबादी अंदाज में तंज कसे तो लोग खुद-ब-खुद ही इरशाद करने पर मजबूर हो जाते थे. अकबर इलाहाबादी ने अपने एक शेर में कहा भी है कि दुनिया में हूं लेकिन दुनिया का तलबगार नहीं हूं. आज हम आपके लिए कविता कोश के सभार से लाए हैं अकबर इलाहाबादी की कुछ शायरियां , शेर और कविताएं...... हंगामा है क्यूं बरपा...
हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है
ना-तजुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब, दिल जिस से है बेगाना मक़सूद है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है वां दिल में कि दो सदमे,यां जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है, अनवर-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है, कि हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं बुत हम को कहें काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है. वाइज़ : धार्मिक उपदेश देने वाला उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है... उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी निकलती हैं दुआऐं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर हक़ीक़त में मैं एक बुलबुल हूँ मगर चारे की ख़्वाहिश में बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनूं है सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर. मौत आई इश्क़ में... मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई निकली बदन से जान तो कांटा निकल गया बाज़ारे-मग़रिबी की हवा से ख़ुदा बचाए मैं क्या, महाजनों का दिवाला निकल गया. हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए... हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए मंज़िल-ए-हस्ती नहीं है दिल लगाने के लिए क्या मुझे ख़ुश आए ये हैरत-सरा-ए-बे-सबात होश उड़ने के लिए है जान जाने के लिए दिल ने देखा है बिसात-ए-क़ुव्वत-ए-इदराक को क्या बढ़े इस बज़्म में आँखें उठाने के लिए ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब बदलियाँ उट्ठीं मगर बिजली गिराने के लिए साँस की तरकीब पर मिट्टी को प्यार आ ही गया ख़ुद हुई क़ैद उस को सीने से लगाने के लिए जब कहा मैं ने भुला दो ग़ैर को हँस कर कहा याद फिर मुझ को दिलाना भूल जाने के लिए दीदा-बाज़ी वो कहाँ आँखें रहा करती हैं बंद जान ही बाक़ी नहीं अब दिल लगाने के लिए मुझ को ख़ुश आई है मस्ती शेख़ जी को फ़रबही मैं हूँ पीने के लिए और वो हैं खाने के लिए अल्लाह अल्लाह के सिवा आख़िर रहा कुछ भी न याद जो किया था याद सब था भूल जाने के लिए सुर कहाँ के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन जोश-ए-दिल काफ़ी है अकबर तान उड़ाने के लिए. हाले दिल सुना नहीं सकता ... हाले दिल सुना नहीं सकता लफ़्ज़ मानी को पा नहीं सकता इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता होशे-आरिफ़ की है यही पहचान कि ख़ुदी में समा नहीं सकता पोंछ सकता है हमनशीं आँसू दाग़े-दिल को मिटा नहीं सकता मुझको हैरत है इस कदर उस पर इल्म उसका घटा नहीं सकता. कोई हंस रहा है कोई रो रहा है... कोई हंस रहा है कोई रो रहा है कोई पा रहा है कोई खो रहा है कोई ताक में है किसी को है गफ़लत कोई जागता है कोई सो रहा है कहीं नाउम्मीदी ने बिजली गिराई कोई बीज उम्मीद के बो रहा है इसी सोच में मैं तो रहता हूं 'अकबर' यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है.
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