रूठना तो हमे भी आता हैं लेकिन मनाने कहा कोई आता हैं
रूठना तो हमे भी आता हैं लेकिन मनाने कहा कोई आता हैं
घुटते रहे दर्द को पीते रहे खुद ही फिर भी खुशियाँ सबमे बार-बार बांटता हैं अकेले में खुद ही आशु बहाता हैं
रूठने का फायदा ही क्या जो दिल की कही वो नहीं कोई सुन पाता हैं रूठे धरती का प्यास बुझा बादल उसे मनाता है. तितली और भवरो को मनाने फूल हर रोज खिल खिलाते हैं नदियों की जिद पूरी करने के लिए पहाड़ भी रास्ता बनाता हैं
एक हम है जिसे मनाने कहा कोई आता हैं... फूल न हो तो भवरो का क्या काम बिन बरसात मयूरी भी हो जाती उदास कैसा सावन जिसमे ना हो बरसात
रूठे ही क्यों जब कोई मनाने नहीं आता हैं लाख दर्द के बिच भी मुस्कुराना सीखा हमने फिर कभी इश्क़ नहीं करने का कसम खाया हमने
रूठना हमे भी आता हैं लेकिन मनाने कहा कोई आता हैं
काश होता कोई राहो में साथ निभाता रूठने से पहले ही हमे मनाता
करते कुर्बान पूरी जिंदगी उस पर काश कोई तो प्यार लुटाती हम पर कहने से पहले ही समझ जाता
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